जीवन की विभिन्न अनिश्चिताओं के बीच भारत की अधिकांश आबादी बहुत सीमित सामाजिक सुरक्षा के बीच रहती है। सामाजिक सुरक्षा का सरल शब्दों में अर्थ है- ऐसी सुरक्षा जो राज्य यानि सरकार अपने नागरिकों को मानवीय जीवन के कुछ संभावित जोखिमों जैसे, वृध्दावस्था, अक्षमता(Disability), कार्य के दौरान चोट, बीमारी, दुर्घटना, मातृत्व, कमाने वाले सदस्य की मृत्यु इत्यादि के खिलाफ प्रदान करती है। यह सुरक्षा, नागरिकों को उनकी आय-सुरक्षा तथा स्वास्थ्य-सुरक्षा के रूप में प्रदान की जाती है।
भारत एक विकासशील देश है। इस नाते लोग जिस स्तर की सामाजिक सुरक्षा की अपेक्षा करते है, वह उन्हें नही मिल पा रही है। देश के कुछ वर्गों, विशेष रूप से सरकारी सेवाओं के कर्मचारी एवं राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों को छोड़ दे तो, शेष आबादी के पास कोई ठोस सामाजिक सुरक्षा नहीं है। भारत के लोग अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकार के बजाय स्वयं के संसाधनों पर निर्भर रहने को मजबूर है। हमारे देश के नागरिक अपने धन के बदौलत ही सामाजिक रूप से सुरक्षित महसूस कर पाते है जो न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश की विभिन्न सरकारों की एक बड़ी नाकामी है। इस आर्टिकल में देश में सामाजिक सुरक्षा की खराब स्थिति पर विस्तृत चर्चा की गई है।

भारत में सामाजिक सुरक्षा की स्थिति
वृद्धावस्था एक नैसर्गिक अवस्था है जिससे हर व्यक्ति गुजरता है। उम्र के इस पड़ाव में आय-सुरक्षा बहुत आवश्यक होती है। देश में सरकारी सेवाओं से सेवानिवृत लोगों के अलावा शेष वरिष्ठ नागरिकों(60 वर्ष से ऊपर) के पास सामाजिक सुरक्षा के रूप में कोई ठोस वित्तीय सुरक्षा मौजूद नहीं है। वर्तमान में सरकारें निर्धन बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएँ चलाती है किन्तु इनके तहत मिलने वाली पेंशन की राशि इतनी कम होती है कि आज के दौर में कोई मुश्किल से गुजारा कर पाएँ। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में पात्र बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन के रूप मे प्रतिमाह 600 रुपये दिए जाते है। यही हाल अधिकतर राज्यों की पेंशन योजनाओं का है।
बीमारी, किसी भी व्यक्ति के लिए एक संभावित जोखिम है। इस स्थिति में व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य-सुरक्षा विशेष मायने रखती है। यानि अगर व्यक्ति किसी बीमारी की चपेट में आ जाए तो राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसके स्वास्थ्य देखभाल सुरक्षा काे सुनिश्चित करे। यह सुरक्षा राज्य द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए की जाती है। लेकिन सर्वविदित है कि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की हालत खराब स्थिति में है। भारत के अधिकतर लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर है जहाँ पैसे का बोलबाला चलता है। दुर्भाग्य से अगर व्यक्ति किसी बीमारी की चपेट में आ जाए तो शायद ही वह सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के भरोसे रह सकता हो। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5(NFHS-5) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 49.9 प्रतिशत परिवार सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर भरोसा नहीं करते है। ऐसी परिस्थितियों में लोग कैसे अपनी स्वास्थ्य-सुरक्षा के प्रति निश्चिंत रह सकते है?
मातृत्व किसी भी महिला के लिए जैविक घटना है। मातृत्व की दशा में कामकाजी महिलाओं के लिए उनके रोजगार की सुरक्षा तथा आय- सुरक्षा आवश्यक होती है। भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के तहत हर कामकाजी महिला को सवेतन मातृत्व अवकाश(Maternity leave)देने का प्रावधान है। यह प्रावधान सरकारी तथा निजी दोनों क्षेत्रों पर लागू होता है। व्यावहारिक धरातल पर सरकारी क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं को बहुत आसानी से मातृत्व लाभ मिल जाता है। लेकिन निजी क्षेत्र में बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों को छोड़ दे तो शायद ही कामकाजी महिलाओं को यह लाभ पाता है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए यह केवल कागजी नियम से ज्यादा कुछ नहीं है।
अपराध, किसी भी व्यक्ति के लिए संभावित जोखिम हो सकता है। अपराध के खिलाफ सुरक्षा एवं न्याय सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। हर व्यक्ति यह आशा करता है कि राज्य उसे अपराध से सुरक्षा प्रदान करे तथा अपराधिक दुर्घटनाओं का शिकार होने पर उसे न्याय मिल सके। भारत में अपराधिक न्याय प्रणाली कितनी जर्जर है, इसका आभास सभी को है। सैद्धांतिक रूप में भारत में कानून के समक्ष सभी लोग समान है किन्तु लोग आरोप लगाते है कि व्यावहारिक रूप में देश का कानूनी सिस्टम प्रभावशाली तथा आम लोगों पर अलग-अलग तरीके से काम करता है।यह आरोप काफी हद तक सच मालूम पड़ता है। अक्सर हमारे आस-पास ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती है जहाँ व्यक्ति अगर धन तथा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो तो कानूनी नियमों एवं प्रकियाओं से समझौते बहुत आसानी से हो जाते है। वहीं दूसरी ओर हमारे न्यायतंत्र में इतनी खामियाँ है कि लोग न्याय पाने के लिए सालों तक तरसते रह जाते है। ऐसी स्थिति में कोई व्यक्ति स्वयं को कैसे सामाजिक रूप से सुरक्षित महसूस कर सकता है।
निष्कर्ष
उपरोक्त चर्चा के बाद निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि देश में जमीनी तौर पर सामाजिक सुरक्षा की हालत खराब है। सरकारों द्वारा जो सामाजिक सुरक्षा दी जा रही है, वह न केवल सीमित है बल्कि निम्न गुणवत्तायुक्त भी है, जिसके कारण नागरिकों के मन में हमेशा अनिश्चितता की भावना बनी रहती है। यह दर्शाता है कि सरकारें नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है। इस विफलता के पीछे भारत की अधिक जनसंख्या को जिम्मेदार कहा जा सकता है, किन्तु यह इकलौता कारण नहीं है। सामाजिक सुरक्षा कि इस दुर्दशा का मुख्य कारण सरकारों द्वारा अपने मूल कर्तव्यों का निर्वहन करने में रूचि न होना है। नागरिको की बेहतर स्वास्थ्य देखभाल की सुरक्षा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना , श्रम कानूनों को जमीनी स्तर पर लागू करना इत्यादि कार्य सरकारों के मूल कार्यों से अलग नहीं है बल्कि यह राज्य की नागरिकों के प्रति मूल जिम्मेदारी है। इसके बावजूद भी देश की सरकारें इस कार्यों के प्रति उदासीन दिखाई देती हैं। सामाजिक सुरक्षा लोगों के लिए कोई लग्जरी सुविधा नही है बल्कि यह समाज की एक बुनियादी आवश्यकता है। यह व्यक्ति के भीतर निश्चिंतता का भाव पैदा करती है। सरकारों को सामाजिक सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में जगह देना चाहिए। तभी लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा सिद्ध होगी।
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