भारत में अतिक्रमण की समस्या भयावह रूप में विद्यमान है। अतिक्रमण का सरल शब्दों में अर्थ है – नियत(निर्धारित) सीमा से आगे बढ़ना। भारत का ऐसा कोई कोना नहीं है जो अतिक्रमण की समस्या से जूझ न रहा हो। प्रथमदृष्टया यह बहुत मामूली समस्या लग सकती है किन्तु यह इतनी आम और व्यापक समस्या बन चुकी है कि इसे अगर राष्ट्रीय समस्या कहा जाए, तो यह गलत नहीं होगा।

अतिक्रमण ने देश में आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत के किसी छोटे कस्बे से लेकर बड़े शहरों तक सड़कें, फुटपाथ, ड्रेनेज, पार्किंग, जल संरचनाएँ यानि तालाब, नाले, झील इत्यादि सभी अतिक्रमण की चपेट में है। अतिक्रमण के कारण सँकरी सड़के एवं गलियाँ, फुटपाथ में रेहड़ी या दुकानें, सरकारी जमीनों में अवैध झुग्गियाँ का बनना , नियत सीमा से आगे बढ़कर निर्माण कार्य इत्यादि समस्याएँ भारत में बहुत आम हो चुकी है।
केन्द्र सरकार द्वारा संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक देशभर में रेलवे की 930 हेक्टेयर भूमि तथा रक्षा मंत्रालय की 10354 एकड़ भूमि अतिक्रमण के अधीन है। इस लेख में अतिक्रमण की समस्या तथा इसके स्थाई समाधानों पर विस्तृत चर्चा की गई है।
अतिक्रमण की समस्या का भारत के विकास पर प्रभाव
अतिक्रमण की समस्या ने भारत के विकास पर बहुआयामी प्रभाव डाले है। इसने नागरिकों के लिए आम जनजीवन से जुड़ी कई समस्याओं को जन्म दिया है, जिससे भारत के विकास में नकारात्मक प्रभाव पडे़ है। आइए नीचे कुछ महत्वपूर्ण प्रभावों पर चर्चा करें-
अतिक्रमण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव शहरी जनजीवन पर पड़ा है। किसी भी देश के शहर उसके विकास के सूचक होते है। अतिक्रमण ने शहरी बुनियादी ढाँचे जैसे सड़के, फुटपाथ, ड्रनेज सिस्टम, पार्क आदि को न केवल प्रभावित किया है, बल्कि इनकी गुणवत्ता को भी निम्न स्तर पर ला दिया है। देश के मेट्रोसिटी कहलाने वाले बड़े शहरों के ड्रनेज सिस्टम थोड़ी सी बारिश से भी इन्हें जलमग्न होने से नहीं बचा पाते है। हमारे देश में फुटपाथ पैदल चलने वालों की बजाय रेहड़ीवालें एवं दुकानदार उपयोग करते है। शहरों में कई इलाके ऐसे होते है जहाँ की सड़के अतिक्रमण के कारण इतनी सँकरी हो जाती है कि दो दोपहिया वाहन भी आमने-सामने से गुजर न पाँए। शहरों के नियोजित विकास के उद्देश्य से बनाये गए मास्टरप्लान अतिक्रमण और अवैध निर्माण की समस्या के कारण धरे के धरे रह जाते है, जिससे शहरों का अनियोजित तरीके से विस्तार होते रहता है। इन सब परिस्थितियों ने भारतीय शहरों को कुरूप, अव्यवस्थित एवं अराजक बना दिया है जिससे भारतीय शहरी जीवन की गुणवत्ता भी निम्न स्तर में पहुँच गई है।
अतिक्रमण की समस्या देश में विकास परियोजनाओ(प्रोजेक्ट) के क्रियान्वयन में देरी के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। किसी भी विकास परियोजना के लिए भूमि एक अनिवार्य घटक है। यह स्थिति अक्सर शहरों मे देखी जाती है कि सरकारों को किसी परियोजना के लिए जमीनें प्राप्त करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है क्योंकि जमीनें अतिक्रमण युक्त होती है। इससे न केवल परियोजनाओं मे देरी होती है बल्कि इनकी लागत में भी बढ़ोतरी होती है। अंततः इससे सरकारी धन की ही बर्बादी होती है।
अतिक्रमण की समस्या से पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचा है। वन भूमि, नदियों के तटों, पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय अतिक्रमण के कारण प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हुई है। इस तरह अतिक्रमण भारत को कई तरह से प्रभावित कर रहा है।
अतिक्रमण के खिलाफ स्थाई समाधान
अतिक्रमण की समस्या की व्यापकता एवं देश के विकास पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को देखते हुए इस समस्या का स्थाई समाधान अति आवश्यक हो गया है। भारत में अतिक्रमण से निपटने के लिए राज्यों के अपने-अपने कानून है जिसके तहत अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। आमतौर पर स्थानीय प्रशासन किसी जगह पर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाता है, किन्तु कुछ समय बाद उस जगह पर पुनः अतिक्रमण हो जाता है। इस प्रकार का अनुभव हर भारतीय का रहा है। इस तरह सरकारी कार्रवाइयों का सिलसिला अंतहीन रुप से चलता रहता है और अतिक्रमण की समस्या जस की तस बनी रहती है। सरकारों को अतिक्रमण की समस्या के प्रति गंभीर होकर इसके ठोस एवं स्थाई समाधानों पर काम करने की जरुरत है।
अतिक्रमण के विशाल एवं राष्टव्यापी समस्या बन जाने मे मुख्य वजह लोगों की अतिक्रमण के प्रति मानसिकता है। देश के लोगों की मानसिकता में अतिक्रमण करना बहुत मामूली कृत्य है। ऐसी मानसिकता होने के कारण लोग स्वाभाविक रुप से अतिक्रमण करने से बिल्कुल भी झिझकते नहीं है जिसके परिणामस्वरुप यह इतनी विशाल समस्या बन चुकी है। यही इस समस्या का मूल कारण है तथा इसके स्थाई समाधान के लिए इस मनोवैज्ञानिक पहलु पर प्रमुखता से काम करने की आवश्यकता है।
जिस प्रकार किसी अपराध को नियंत्रित करने के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया जाता है ताकि अपराधियों के भीतर डर का भाव पैदा हो जिसके कारण वे अपराध करने से डरे। इसी तरह अतिक्रमण को भी गंभीर कृत्य मानकर सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया जाना जाना चाहिए ताकि लोग अतिक्रमण करने से डरे। इसके लिए सख्त कानूनों का निर्माण हो एवं इन्हें प्रभावी रुप से लागू किया जाए। इसके अतिरिक्त सरकारी एजेंसियों एवं स्थानीय शासन यानि नगर निगम, नगरपालिका आदि को अतिक्रमण के खिलाफ अपने निगरानी तंत्र को चुस्त-दुरुस्त बनाना चाहिए।
आमतौर पर देखा जाता है कि लोग राजनीतिक संरक्षण के बलबूते अतिक्रमण करते है या फिर संरक्षण के चलते उनके द्वारा किए गए अतिक्रमण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है। इससे अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। अतः सरकारों को इस तरह की गलत परंपराओं एवं पक्षपातों को भी मिटाना होगा।
निष्कर्ष
इस लेख के निष्कर्ष के रुप में कहा जा सकता है कि अतिक्रमण की समस्या का ठोस एवं स्थाई समाधान तभी संभव है जब लोगों की अतिक्रमण के प्रति मानसिकता में बदलाव आए। इस बदलाव को लाने के लिए सरकारों को अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करने के अपने पुराने ढर्रे को छोड़ना होगा जिसमें कार्रवाई केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित रहती है। सरकारों को अतिक्रमण से निपटने के लिए ठोस एवं प्रभावी कानूनों का निर्माण करना चाहिए तथा इन्हें सख्ती से धरातल पर लागू करना चाहिए। इन कानूनों में अतिक्रमण हटाने के साथ भारी आर्थिक जुर्माने का प्रावधान भी होना चाहिए। कुल मिलाकर बात कही जाए तो लोगों के भीतर अतिक्रमण के प्रति डर का भाव पैदा करके ही इस समस्या का प्रभावी समाधान किया जा सकता है। अतः सरकारों को अतिक्रमण के खिलाफ मनोवैज्ञानिक, प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर प्रभावी उपाय करना चाहिए, अन्यथा देश इस समस्या से अतंहीन रूप से जूझता ही रहेगा और देश का विकास हमेशा बाधित ही रहेगा।
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