दया याचिका मृत्युदंड पाए हुए दोषियों के लिए एक संवैधानिक उपाय है जिसके तहत वे राष्ट्रपति के समक्ष अपनी मौत की सजा को माफ करने के लिए दया याचिका दायर करते हैं।
संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को किसी अपराध के दोषी की सजा को माफ, निलंबित करने तथा सजा की अवधि को कम करने की शक्ति देता है। हांलाकि इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद(केन्द्रीय गृह मंत्रालय) की सलाह पर किया जाता है। इसके तहत मौत की सजा पाए दोषी अपने समस्त न्यायिक उपायों का प्रयोग करने के पश्चात एक अंतिम उपाय के तौर पर राष्ट्रपति के समझ दया याचिका प्रस्तुत करते हैं।

दया याचिका की अवधारणा कोई नयी नहीं है। भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा जैसे कई देशों में भी दोषियों की सजा माफ करने की व्यवस्था है। दया याचिका की अवधारणा के पीछे सिध्दांत है कि किसी भी न्यायिक प्रणाली में गलतियों की संभावना हमेशा बनी रहती है। अतः इन गलतियों से बचने के लिए सुरक्षा उपाय के तौर पर दया याचिका की व्यवस्था को अपनाया गया है। इस लिहाज से दया याचिका की व्यवस्था का विशेष महत्व है।
असल समस्या यह है कि पिछले करीब तीन दशकों से दया याचिकाओं को अत्यधिक समय तक लंबित रखने की प्रवृत्ति देखी गई है, जिसके परिणामस्वरूप जघन्य एवं विभत्स अपराधों के दोषी उनके अंजाम तक नहीं पहुँच पा रहे है। ऐसी स्थिति में दुर्लभतम एवं जघन्य अपराधों से पीड़ित लोगों के लिए न्याय पाना बहुत कठिन हो चुका है। इस लेख में इस मुद्दे पर प्रकाश डाला गया है।
दया याचिका कैसे न्याय के राह में बाधा बन गई है?
भारत में किसी मुकदमे के निपटारे में सालों एवं दशकों का समय लग जाता है। हमारी अपराधिक न्याय प्रणाली जघन्य तथा दुर्लभतम मामलों मे मृत्युदंड का प्रावधान करती है। ऐसे मामले निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट के स्तर तक पहुँचते है। चूंकि हमारे देश में न्याय की रफ्तार इतनी धीमी है कि किसी अपराधिक मामले का निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक निपटारा होनें में पहले ही काफी समय लग चुका होता है। सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा पाए दोषी अंतिम उपाय के तौर पर राष्टपति के समक्ष दया याचिका दायर करते है। यहाँ पीड़ितों का न्याय के लिए इंतजार का एक नया दौर शुरू हो जाता है।
पिछले लगभग तीन दशकों से दया याचिका को वर्षो तक लंबित रखने की एक पंरपरा सी विकसित हो गयी है। मौत की सजा पाए दोषियों की दया याचिकाएँ सालों-साल तक राष्ट्रपति के समक्ष लंबित पड़ी रहती है या फिर राज्य सरकारों तथा केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पास सिफारिशों के लिए अटकी रहती है। लेकिन इन पर सही समय पर फैसला नहीं लिया जाता है। यह कड़वी सच्चाई है कि अतीत में राष्ट्रपतियों द्वारा दया याचिका के निपटारे के प्रति उपेक्षा की गई है। उदाहरण के लिए देश के 11वें राष्ट्रपति रहे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम(2002-2007) ने अपने कार्यकाल के दौरान केवल दो दया याचिकाओं पर फैसला लिया, शेष याचिकाओं को लंबित ही रहने दिया। वही देश के 10वे राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन(1997-2002) ने तो अपने कार्यकाल में एक भी दया याचिका पर फैसला नहीं लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिकाओ के निपटारे मे हो रहीं देरी के संदर्भ मे अपने एक ऐतिहासिक फैसला दिया कि दया याचिका पर फैसला लेने में अनुचित तथा अत्याधिक देरी दोषियों के लिए यातना के बराबर है जो दोषियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अतः दया याचिका पर फैसला लेने में अनुचित एवं अत्याधिक देरी के आधार पर मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
इस फैसले के परिणामस्वरूप मौत की सजा पाए दोषी अपनी दया याचिकाओं पर फैसले में हुई देरी के आधार पर अपनी सजा को आजीवन कारावास में बदलने में सफल हुए। दया याचिकाएँ तथा फाँसी की सजा किस तरह लेटलतीफी एवं कानूनी पेंच में फँस जाती है, इसका अनुमान इन तथ्यात्मक आकड़ों से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 से वर्तमान वर्ष 2025 तक की समयावधि में विभिन्न राष्ट्रपतियों ने अदालत से फाँसी की सजा पाए 44 दोषियों की दया याचिकाएँ खारिज की। लेकिन इन 25 वर्षों में केवल 8 दोषियों को ही फाँसी दी गई तथा शेष दोषियों की फाँसी की सजा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दया याचिका पर फैसला लेने में अनुचित एवं अत्याधिक देरी के आधार पर आजीवन कारावास में बदल दी गई या फिर इसी आधार पर सजा से राहत पाने के लिए दोषियों की याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
इस पूरी प्रकिया से सबसे अधिक नुकसान उन पीड़ितो का हुआ है जिन्होनें इन दोषियों द्वारा किए गए विभत्स अपराधों की विभीषिका को सहन किया है। अंततः इससे पीड़ितों को अन्याय ही मिला है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः राष्ट्रपति के लिए दया याचिका के निपटारे के संबंध में समय सीमा बहुत जरुरी है। वर्तमान में राष्ट्रपति के लिए समय सीमा का कोई भी संवैधानिक प्रावधान नहीं है और यही दया याचिका के लंबे समय तक लंबित रहने का कारण है। वर्तमान में अच्छी बात यह हुई है कि नये अपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता(BNSS) में दया याचिका दायर करने तथा उसके निपटान के लिए एक मानक प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति द्वारा दिए गए निर्णय को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर किया गया है। अब देखना यह होगा कि इस प्रक्रिया पर व्यावहारिक रूप से किस प्रकार अमल किया जाता है।
किसी भी गंभीर और जघन्य अपराध के लिए कठोर सजा का प्रावधान इसलिए किया जाता है ताकि अपराधियों और समाज में एक ठोस संदेश जाए। दया याचिका के निपटारे में वर्षों से जो उपेक्षा और लेटलतीफी बरती गई है उसने मौत की सजा के उद्देश्य को ही विफल कर दिया है।
राष्ट्रपति को संवैधानिक नैतिकता का परिचय देते हुए समयबद्ध तरीके से दया याचिकाओं पर उचित निर्णय लेना चाहिए। साथ ही दोषियों की दया याचिकाओं पर भावनात्मक आधार पर फैसला लेने के बजाए न्यायसंगत एवं तार्किक आधारों पर फैसला लेना चाहिए। यह तथ्य है कि अतीत में दया याचिकाओं के द्वारा ऐसे दोषियों की मौत की सजा भावनात्मक मुद्दों के आधार पर माफ कर दी गई जिन्होंने विभत्स अपराध किए थे। अतः राष्ट्रपति तथा सरकारों को दया याचिका पर फैसला लेते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका निर्णय न केवल दोषियों तथा पीड़ितों को प्रभावित करता है बल्कि इसका व्यापक प्रभाव समाज पर भी पड़ता है।
READ ALSO- न्यायपालिका में न्यायिक अतिक्रमण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।