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वर्ष 2026 में प्रस्तावित परिसीमन को टालना ही बेहतर साबित होगा।

वर्ष 2026 में लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाना है। इससे लोकसभा सीटों का संख्या बढ़ने की संभावना है। परिसीमन से तात्पर्य, जनसंख्या में हुए परिवर्तन को समायोजित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निधारण करने से है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 82 एवं 170 क्रमशः लोकसभा तथा विधानसभा सीटों के परिसीमन का प्रावधान करता है। वर्तमान में राज्यों को निर्वाचन सीटों का आवंटन सन् 1971 की जनगणना पर आधारित है। सन् 2026 में परिसीमन के जरिये लोकसभा तथा विधानसभा सीटों की संख्या को बढ़ाया जाना प्रस्तावित है। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान राज्यों में जनसंख्या के समानुपातिक आधार पर निर्वाचन सीटों को आवंटित करने का प्रावधान करता है। दूसरे शब्दों में, हर राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में निर्वाचन सीटें आवंटित की जाती है।

परिसीमन के कारण राज्यों में लोकसभा सीटों की अनुमानित संख्या।
परिसीमन के बाद राज्यवार अनुमानित लोकसभा सीटों की संख्या।

परिसीमन इतना विवादित क्यों है ?

परिसीमन में दो पहलू शामिल होते हैं। पहला – निर्वाचन सीटों की सीमाओं का पुनर्निधारण। दूसरा- राज्यों में निर्वाचन सीटों का आवंटन(बँटवारा)। परिसीमन के पहले पहलू में कोई विवाद नहीं है, किन्तु इसका दूसरा पहलू विवादास्पद बना हुआ है। यही कारण है कि वर्तमान में निर्वाचन सीटों का आवंटन वर्ष 1971 की जनगणना पर आधारित परिसीमन के हिसाब से है जबकि भारतीय संविधान प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अभ्यास के द्वारा निर्वाचन सीटों की सीमाओं के पुनर्निधारण एवं पुनःआवंटन का प्रावधान करता है।

42वे संविधान संसोधन अधिनियम (1976) के द्वारा लोकसभा तथा विधानसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक यथावत रखने का प्रावधान किया गया। पुनः 84वाँ संविधान संसोधन अधिनियम (2001) में इस समय सीमा को वर्ष 2026 तक बढ़ा दिया गया।

चूंकि राज्यों मे लोकसभा एवं विधानसभा सीटों का आवंटन जनसंख्या के समानुपातिक आधार पर किया जाता है, लेकिन इसमें कुछ समस्याएँ है। इस प्रक्रिया में अधिक जनसंख्या वाले राज्य ज्यादा राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल कर लेते हैं। वहीं कम जनसंख्या वाले राज्य इसमें पिछड़ जाते हैं। इसी को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में आगामी परिसीमन को लेकर विरोध के स्वर उठ रहे हैं।

दक्षिण भारतीय राज्यों को आशंका है कि अगर परिसीमन में जनसंख्या के समानुपतिक आधार पर निर्वाचन सीटों का आवंटन किया गया तो उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। यह आशंका काफी हद तक सही भी है।

परिसीमन को टाल देने के पक्ष में तर्क।

वर्तमान में राज्यों में निर्वाचन सीटों का आवंटन वर्ष 1971 की जनगणना पर आधारित है। वर्ष 1971 में भारत की आबादी लगभग 54 करोड़ थी, आज अनुमानित आबादी 140 करोड़ है। आबादी में आए इतने बडे़ अंतर का समानुपातिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से उचित समायोजन(Adjustment) आवश्यक हैं। लेकिन वर्तमान में राज्यों की जनसांख्यिकीय(Demographic) परिस्थितियों में काफी अंतर आ चुका है।

वर्ष 1971 में भारत के सभी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक थी। किन्तु वर्ष 1971 से लेकर अभी तक दक्षिण भारत और उत्तर भारत के राज्यों मे जनसंख्या वृद्धि दर समान नहीं रही है। उदाहरण के लिए, अगर तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि के अंतर को जानने का प्रयास करें, तो हम काफी बड़ा अंतर पाते हैं। एक ओर जहाँ तमिलनाडु की आबादी वर्ष 1971 की जनगणना के अनुसार लगभग 4 करोड़ से ज्यादा थी, आज इसकी अनुमानित आबादी 8 करोड़ से अधिक है अर्थात आबादी में दोगुनी वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर उत्तर भारत के प्रमुख राज्य उत्तर प्रदेश की आबादी वर्ष 1971 में लगभग 8 करोड़ थी, वर्तमान में इसकी अनुमानित आबादी लगभग 24 करोड़ है, अर्थात आबादी में तीन गुना वृद्धि हो चुकी है। ऐसी स्थिति में जनसंख्या के आधार पर सीटों का आवंटन दक्षिण भारतीय राज्योंं के लिए अन्यायपूर्ण होगा। इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन की स्थिति पैदा होगी।

अगर परिसीमन में निर्वाचन सीटों के पुनःआवंटन से दक्षिण भारतीय राज्यों को उत्तर भारतीय राज्यों के अपेक्षा सीटों का नुकसान होता है,तो इन राज्यों में क्षेत्रवाद बढ़ सकता है। इससे अलगाववाद(Separatism) की भावना की पैदा हो सकती है। वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारतीय राज्यों के राजनीतिक दलों की राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्वशाली स्थिति कायम हो सकती है। इन सबके परिणामस्वरूप देश मे उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत की स्थिति निर्मित हो जाएगी।

भारत जैसे विविधता भरे देश में पहले से ही राज्यों के बीच भाषाई विवाद, केन्द्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी में अंतर, अप्रवासी श्रमिक, नदियों के जल का बँटवारा इत्यादि को लेकर विवाद बने हुए हैं। इन सबके अतिरिक्त अगर परिसीमन के तहत् सीटों का आवंटन भी विवादित बन जाता है, तो इससे देश आंतरिक विवादों में ही उलझता चला जाएगा।

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मेरा दृष्टिकोण।

मेरे विचार से वर्ष 2026 में होने वाले परिसीमन को केवल निर्वाचन सीटों की सीमाओं के पुनर्निधारण तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। राज्यों में निर्वाचन सीटों के मौजूदा आवंटन को जस का तस रहने दिया जाना चाहिए। अगर परिसीमन के तहत् सीटों का पुनः आवटन किया भी जाता है तो ऐसे फार्मूले को अपनाना चाहिए जिस पर सभी राज्यों की आम सहमति हो।

परिसीमन के कारण दक्षिणी राज्यों, जो कि जनसंख्या नियंत्रण, आर्थिक विकास, टेक्स कलेक्शन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(FDI), साक्षरता जैसे मामलों में अव्वल हैं, उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए।

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