भारत की बहुत बड़ी कार्यशील आबादी प्राइवेट सेक्टर में काम करती है। भारत का प्राइवेट सेक्टर अपने कर्मचारियों से जी-तोड़ काम लेने तथा उसके बदले कम वेतन देने के लिए जाना जाता है। दिसंबर 2024 में प्रतिष्ठित संस्थाए फिक्की ओर क्वेश कार्प लिमिटेड द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 से वर्ष 2023 तक की अवधि में निजी क्षेत्र का मुनाफा चार गुना बढ़ा है किन्तु निजी कर्मचारियों के वेतन में कुछ खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। रिपोर्ट की माने तो इस अवधि में विभिन्न सेक्टरों में कर्मचारियों की चक्रवृध्दि वार्षिक वेतन वृध्दि दर 0.8 प्रतिशत से लेकर 5.4 प्रतिशत तक रही है। जबकि वर्ष 2019 से वर्ष 2023 तक, इन पाँच वर्षों में खुदरा महँगाई दर क्रमशः 4.8%, 6.2%, 5.5%, 6.7%, और 5.4%प्रतिशत रही है। दूसरे शब्दों में प्राइवेट सेक्टर के मुनाफे तथा महँगाई दर के हिसाब से प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। इससे बाजार में माँग प्रभावित हो रही है।

प्राइवेट सेक्टर बेहतर वेतन देने में कंजूस क्यों?
प्राइवेट सेक्टर का प्राथमिक उद्देश्य स्वयं के लिए अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है। इसकी प्राप्ति के लिए वे विभिन्न प्रकार की लागत कटौती करते है, जिनमें कम वेतन देना, ओवरटाइम काम लेना आदि शामिल होते है। सरकारों द्वारा श्रमिकों के लिए समय-समय पर न्यूनतम वेतन तय किया जाता है, जो कागजों तक ही सीमित होता है। वहीं व्हाइट कॉलर जॉब यानि ऐसी नौकरियाँ जिनमें मानसिक श्रम की अधिकता होती है; उनके लिए न्यूनतम वेतन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र में ओवरटाइम, अवकाश, मातृत्व अवकाश आदि से संबंधित श्रम कानूनों का जमीनी स्तर में कोई ठोस प्रवर्तन(Enforcement) नहीं हो रहा है।
श्रम कानूनों को लागू कराने लागू के लिए सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव है। इसके पीछे कुछ छुपे हुए कारण समझ आते है। पहला- निजी क्षेत्र का सरकारों की नीतियों पर अदृश्य प्रभाव। दूसरा- निवेश छिटक जाने का डर। कई बार सरकारें निवेश आकर्षित करने के लिए या ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के नाम पर श्रम कानूनों को सख्ती से लागू करने से परहेज करती हैं।
सरकारों से अपेक्षाएँ:
यह कड़वी सच्चाई है कि निजी क्षेत्र स्वतः अपने कर्मचारियों को उनके उचित हक नहीं देगा। ऐसी स्थिति में सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका हो जाती है। सरकारों को ही राज्य शक्ति का प्रयोग कर निजी कर्मचारियों एवं श्रमिकों के उचित वेतन को सुनिश्चित कराना होगा।
जिस प्रकार सरकारें, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन के निर्धारण के लिए वेतन आयोग का गठन करती है, उसी तरह निजी कर्मचारियों के लिए भी वेतन आयोग के गठन जैसी प्रकिया अपनाई जानी चाहिए। इसकी मानने योग्य सिफारिशों को निजी क्षेत्र के लिए बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए। मौजूदा श्रम कानूनों को जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, तभी इसकी सार्थकता रहेगी।
READ ALSO – निजी स्वास्थ्य क्षेत्र आखिर कब तक लोगों को लूटता रहेगा।
मेरा दृष्टिकोण:
मेरा इस संदर्भ में स्पष्ट दृष्टिकोण है कि निजी क्षेत्र अपने हितों की पूर्ति के लिए अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण कर रहा है। निजी क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के सामान्य अनुभव इसकी पुष्टि करते है।
यह दुर्भाग्य है कि जहाँ एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले देश में, जहाँ सरकार अर्थव्यवस्था में बहुत सीमित नियंत्रण रखती है; बावजूद इसके वहाँ श्रम कानून एवं न्यूनतम वेतन देने के नियमों का पालन किया जाता है। वहीं दूसरी ओर भारत में ,जहाँ सरकार अर्थव्यवस्था में अच्छा-खासा नियंत्रण रखती है; वहाँ श्रम कानून एवं न्यूनतम वेतन केवल कागजों में ही सिमट कर रह गए हैं।
निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों एवं श्रमिकों के हितों को निजी क्षेत्र की नैतिकता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है, क्योंकि स्वयं के लिए अधिकतम लाभ प्राप्त करना उसकी स्वाभाविक प्रवृति है। अतः निजी कर्मचारियों एवं श्रमिकों के हितों की रक्षा तभी हो सकती है जब सरकारें श्रम कानूनों को जमीनी स्तर पर लागू करे।