भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र पर मेडिकल माफियाओं ने गहरी पैठ स्थापित कर ली है। ‘मेडिकल माफिया’ से तात्पर्य स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद ऐसे अनैतिक एवं अपराधिक तत्वों एवं प्रथाओं से है, जिनका एकमात्र उद्देश्य स्वयं के लिए अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है, चाहे इसके लिए मरीजों के हितों को दरकिनार ही क्यों न करना पड़े। मेडिकल माफिया में डॉक्टर, एम्बुलेंस चालक, अस्पताल, दवा कंपनियाँ, डायग्नोस्टिक सेंटर एवं प्रयोगशालाएँ इत्यादि शामिल होते है। यह सभी तत्व आपसी साँठगाँठ तथा मिलीभगत के जरिये कमीशन मॉडल पर काम करके संगठित लूट को अंजाम दे रहे है। इसे कट प्रेक्टिस भी कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप मरीजों का जमकर आर्थिक शोषण हो रहा है, साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र में अनैतिक गतिविधियाँ लगातार बढ़ती जा रही है। इस लेख में इस गंभीर मुद्दे पर विस्तृत चर्चा की गई है।

‘मेडिकल माफिया’ किस तरह काम करता है?
‘मेडिकल माफिया’ से जुड़े तत्व आपस में अलग-अलग किस्म के गठजोड़ बनाकर परस्पर एक-दूसरे को फायदा पहुँचाते है। आइए इन अनैतिक गठजोड़ो एवं इनकी कार्यप्रणाली पर चर्चा करें–
डॉक्टर- दवा कपंनियों का गठजोड़
चिकित्सा क्षेत्र में डॉक्टर – दवा कंपनियों के बीच साँठगाँठ होना बहुत आम है। इस साँठगाठ में दवा कंपनियाँ डॉक्टरों को उस कंपनी द्वारा निर्मित दवाओं को अपने मरीजों को प्रिसक्राइब करने के बदले कमीशन, महँगे गिफ्ट, विदेशी यात्रा जैसे लुभावने उपहार ऑफर करती है। यह कड़वी सच्चाई है कि अधिकतर डॉक्टर वही महँगी ब्राँडेड दवाएँ मरीजों को लिखते हैं जिसमें उन्हें कमीशन मिलता है। यह अनैतिक प्रेक्टिस पूरे भारत में बहुत आम हो चुकी है। उदाहरण के लिए, आयकर विभाग की एक रेड के दौरान पता चला है कि कोरोना काल के दौरान डोलो 650 नामक टेबलेट को प्रिस्क्राइब करने के बदले इसकी निर्माता दवा कंपनी ने डाक्टरों एवं मेडिकल पेशेवरों को कमीशन और महँगे गिफ्ट्स देने के लिए 1000 करोड़ रुपये खर्च किए। यही कारण है कि सरकारों द्वारा जेनेरिक दवाओं को प्रोत्साहित दिए जाने के बावजूद डाक्टरों द्वारा मरीजों के केवल महँगी ब्रांडेड दवाएँ प्रिस्क्राइब की जाती है जबकि जेनेरिक तथा बाँडेड दोनों दवाओं का साल्ट फार्मूला एवं गुणवत्ता समान होती है।
इसके अतिरिक्त, यह सभी भारतीयों का बहुत आम अनुभव है कि प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डॉक्टरों द्वारा मरीजों को किसी खास मेडिकल स्टोर से दवाएँ खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है। इसका कारण स्थानीय स्तर पर इन मेडिकल स्टोर्स से डॉक्टरों को कट(कमीशन) प्राप्त होना है।
एंबुलेस संचालको – अस्पतालों का गठजोड़
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि एम्बलेंस चालक आपातकालीन स्थिति में मरीजों एवं उनके परिजनों को भ्रमित कर या अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाकर ऐसे निजी अस्पतालों मे ले जाते है जहाँ उन्हे मरीज लाने के बदले कमीशन मिलता है। अक्सर इस प्रकार के दृश्य सरकारी अस्पतालों के परिसरों में दिखाई पड़ते है। यहाँ एंबुलेंस संचालक मरीजों को उस अस्पताल में खराब इलाज का भय दिखाकर किन्हीं निजी अस्पतालों में सस्ता इलाज का हवाला देकर ले जाने का काम करते है। कई बार निजी एबुलेंस कर्मियों द्वारा किसी दुर्घटना स्थल से घायलों को सरकारी अस्पतालों में ले जाने के बजाय कमीशन के लालच में निजी अस्पतालों में भर्ती करा देने की खबरें आती हैं। इससे सबसे ज्यादा नुकसान मरीजों का होता है क्योंकि एंबुलेंस संचालकों को दिया जाने वाला कमीशन का भार मरीजों पर डाला जाता है जिससे उनका इलाज महँगा हो जाता है। वैसे भी भारत में निजी अस्पताल मरीजों को लूटने एवं आर्थिक शोषण करने के लिए कुख्यात है।
छोटे अस्पतालों और बड़े अस्पतालों का गठजोड़
छोटे शहरों व कस्बों में स्थित प्राथमिक स्तर के निजी अस्पतालों के बड़े शहरों में स्थित बड़े निजी अस्पतालों में मरीजों को रेफर करने को लेकर कमीशन आधारित साँठगांठ एवं मिलीभगत होती है। इस साँठगाँठ के तहत छोटे शहरों के अस्पताल नजदीकी बड़े शहरों के निजी अस्पतालों मे मरीजों को रेफर करने के बदले कमीशन प्राप्त करते है। कुछ इसी तरह प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले डॉक्टरो को भी बड़े निजी अस्पतालों मे मरीजों को इलाज के लिए रेफर(सिफारिश) के बदले कमीशन मिलता है।
इसके अतिरिक्त सरकारी अस्पतालों मे कार्यरत डॉक्टरों एवं अन्य स्टाफ द्वारा भी सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए आए मरीजों व उनके परिजनों को छुपे रूप में किसी खास निजी अस्पताल जाने के लिए प्रोत्साहित किए जाने की बातें सामने आती है।
डॉक्टर – डायग्नोस्टिक सेंटर एवं पेथालॉजी लैब के बीच गठजोड़
यह सभी भारतीयों का बहुत सामान्य अनुभव रहा है कि प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले अधिकतर डॉक्टर मरीजों को किसी निश्चित पेधालॉजी लैब या डायग्नोसिस सेंटर से टेस्ट एवं जाँचे करवाने के लिए बाध्य करते है। इसके आलावा किसी अन्य लैब या डायग्नोस्टिक सेंटर की टेस्ट रिपोर्ट की स्वीकार नहीं किया जाता है। इसका कारण डॉक्टर – डायग्नोस्टिक सेंटर के बीच अनैतिक गठजोड़ होना है जिसके तहत जितने मरीजो को इस सेंटरो मे टेस्ट या जाँचे करवाने के लिए भेजा जाएगा, उतना अधिक कमीशन डॉक्टर को मिलेगा तथा उस संबधित डायग्नोस्टिक सेंटर एवं पेथालॉजी लैब की कमाई होगी। यही वजह है कि डॉक्टरों पर अक्सर मरीजों को अनावश्यक एवं महँगे टेस्ट प्रिस्क्राइब करने के आरोप लगते है।
इस प्रकार की साँठगाँठ सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दिखाई पड़ती है। सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों द्वारा भी मरीजों को किसी खास डायग्नोस्टिक सेंटरों मे टेस्ट एवं जाँचे करवाने के लिए कहा जाता है। इस तरह कमीशन का खेल बेरोकटोक जारी है।
सरकारों का रुख
देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में इतने खुले रूप में व्यापक अनैतिक गतिविधियाँ होने के बावजूद सरकारो का इसके प्रति रवैया उपेक्षित रहा है। जिस तरह सरकारों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से मुँह मोड़ लिया है उसी तरह इन अनैतिक गतिविधियों को रोकने में भी उसकी कोई रुचि नही दिखाई पड़ती है। इन अनैतिक गतिविधियों पर लगाने के लिए अभी तक कोई ठोस कानून नही बनाया गया है, न राज्य स्तर पर, न ही केन्द्रीय स्तर पर। ध्यान देने योग्य है कि,स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है यानि इसके लिए मुख्यतः राज्य सरकारें जिम्मेदार है। अभी तक किसी भी राज्य सरकार द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त इस प्रकार की साँठगाँठ एवं अनैतिक गतिविधियों के खिलाफ प्रभावी कदम उठाकर कोई उदाहरण स्थापित नहीं किया गया है।
निष्कर्ष
उपरोक्त चर्चा के बाद निष्कर्ष के रूप मे कहा जा सकता है कि ‘मेडिकल माफिया’ पूरी तरह बेलगाम है। इससे जुड़े तत्व अपने लाभ के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है चाहे इससे मरीजों की जान से खिलवाड़ ही क्यों न होता हो। यह कहना गलत नही होगा कि देश का स्वास्थ्य क्षेत्र कट(कमीशन) प्रेक्टिस की जद मे आ चुका है जहाँ आर्थिक लाभ सर्वोपरि है तथा मरीजों के हित बाद में आते है। इन सबके परिणामस्वरूप मरीजों का भयंकर आर्थिक शोषण हो रहा है।
‘मेडिकल माफिया’ विशेष रूप से निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में सक्रिय है क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण देश की अधिकांश जनता अपनी स्वास्थ्य जरुरतों को लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर हो चुकी है। इसी का फायदा मेडिकल माफिया उठा रहा है। चाहे वह प्राइवेट हास्पिटल हो या दवा कंपनियाँ ।
‘मेडिकल माफिया’ को खत्म करने का एक ही उपाय है कि सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र में जारी अनैतिक गतिविधियों पर शिकंजा कसने के लिए कठोर कानून बनाएँ एवं प्रभावी रूप से इसे लागू करें। इसके अतिरिक्त यह बहुत जरुरी है कि सरकारें सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र मजबूत करने मे अविलंब ध्यान दें क्योंकि इन सारी समस्याओं के मूल मे सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का कमजोर होना है।
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