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भारत में किसी भी क्षेत्र के सुधारों(REFORMS) मे देरी क्यों होती है?

भारत में सुधारों के प्रति उदासीनता एवं उपेक्षा की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। सुधारों से तात्पर्य किसी दोषपूर्ण प्रणाली में बदलाव कर उसे अधिक बेहतर एवं प्रभावी बनाने की प्रक्रिया से है। सुधारों के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति इतनी अधिक है इसका अनुमान इस बात लगाया जा सकता है कि,आजादी के इतने सालों बाद भी देश में अंग्रेजों द्वारा निर्मित कानून, प्रथाएँ एवं विभिन्न प्रणालियाँ आज भी मौजूद है। एक विकसित देश बनने का सपना देख रहे भारत में सुधारों के प्रति जो दृष्टिकोण तथा कदम होने चाहिए, उसका अभाव दिखाई पड़ता है। वही विकसित देशों में सुधारों के मामले में काफी आगे है। हाल में ही आस्ट्रेलिया में सिडनी के बॉन्डी बीच में हुई सामूहिक गोलीबारी की घटना के तत्काल बाद पूरे देश में बहुत सख्त गन कानून बना दिए गए। क्या भारत में इस गति से कभी सुधार हो सकते है?

सुधार को दर्शाती एक प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत में सुधार बहुत आसानी से नहीं होते है। नागरिक समाज को किसी सुधार के लिए दशकों तक संघर्ष करना पड़ता है,तब जाकर किसी सुधार की सुध ली जाती है। सुधार भी तब किए जाते है जब कोई समस्या अपने चरम पर पहुँच जाती है। उदाहरण के लिए, सन् 1991 में आर्थिक सुधार जिन्हें एलपीजी रिफार्म भी कहा जाता है; के माध्यम से अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का फैसला देश में सन् 1991 के चरम आर्थिक संकट के दौरान लिया गया था। वर्तमान में देश में ऐसे अनेक सुधार दशकों से लंबित एवं उपेक्षित पड़े हुए है जो देश एवं नागरिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इस लेख में कुछ ऐसे ही उपेक्षित सुधारों की चर्चा की गई है–

पुलिस सुधार

देश में पुलिस सुधारों की माँग दशको से की जा रही है। देश में मौजूदा पुलिस प्रणाली अंग्रेजों की देन है जो मूल रूप से भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 नामक कानून पर आधारित है। इसे अंग्रेजों ने भारत पर अपने नियंत्रण को मजबूत करने के उद्देश्य से डिजाइन किया था। हांलाकि वर्तमान में राज्यों के अपने-अपने पुलिस कानून है, किन्तु उनमें कोई मूलभूत अंतर नहीं है। ध्यान देने योग्य है कि, भारत में पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है।

दुर्भाग्य से इस औपनिवेशिक विरासत से प्राप्त पुलिस प्रणाली में अनेक दोषों से ग्रस्त है। आज पुलिस प्रणाली अत्याधिक राजनीतिक हस्तक्षेप से ग्रस्त है। जिसके कारण कानून प्रर्वतन पक्षपाती हो चुका है यानि राजनीतिक सत्ताधारियों के हिसाब से कानून प्रर्वतन हो रहा है। इसके अतिरिक्त पुलिस – नागरिक संबंधों में अविश्वास, अत्याधिक काम का बोझ, शक्तियों का दुरुपयोग जैसी समस्याओं से समूचे देश का पुलिस तंत्र ग्रस्त है। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए देश में पुलिस सुधार लाने की माँग लंबे समय से की जा रही है। इस संबंध में कई आयोग, समितियाँ तथा न्यायालयों द्वारा सुझाव एवं सिफारिशें दी जा चुकी है। इन सब के बावजूद पुलिस सुधार मात्र विमर्श का मुद्दा बनकर रह गया है। सरकारों ने पुलिस सुधारों के प्रति बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखाई है जबकि यह नागरिकों के साथ-साथ पुलिस बलों के लिए भी बहुत जरुरी है।

न्यायिक सुधार

देश में न्यायिक सुधारों की अविलंब आवश्यकता है। यह कितने जरूरी एवं महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में देश मे न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों मे लगभग साढे़ पाँच करोड़ से अधिक मामले लंबित है। इसमें भी 4.80 करोड़ मामले निचली अदालतों में लंबित है जो किसी भी मामलें की पहली सीढ़ी होती है। मुकदमों के इतनेे अधिक बोझ के चलते देश का न्यायिक तंत्र समय से न्याय प्रदान करने मे अक्षम हो चुका है। इसके कारण आम जनमानस का देश की न्यायिक प्रणाली के प्रति अविश्वास एवं मोह भंग हो गया है। इन परिस्थितियों ने दूसरी अन्य समस्याओं को जन्म दिया तथा कानून के शासन को भी कमजोर किया है।

देश के न्यायिक तंत्र की इस दुर्दशा के पीछे कई कारक जिम्मेदार है। अदालतों मे जजों की भारी कमी, न्यायिक प्रकियाओं की खामियाँ, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव, मुकदमों के बेहतर प्रबंधन का अभाव इत्यादि कारण इसके लिए जिम्मेदार है। इन्हीं कारणों को दूर कर न्यायिक तंत्र मे अमूलचूल परिवर्तन लाने के लिए दशकों से समग्र न्यायिक सुधारों की माँग पर जोर दिया जा रहा है।

न्यायिक तंत्र की इतनी भयावह दुर्दशा के बावजूद न्यायिक सुधारों की ओर कोई प्रगति या पहल नही दिखती है। अभी तक सरकारों की तरफ से कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए है जो मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव ला सके। जबकि न्यायिक सुधारों में सबसे प्रमुख भूमिका सरकारों को ही निभानी है। आखिर सरकारें न्यायिक सुधारोंं के प्रति कब संजीदा होंगी?

चुनाव सुधार

देश में चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता को बनाए रखने के अब तक कई सुधार हुए है। लेकिन संभवतः 1980 के दशक से शुरू हई राजनीति के अपराधीकरण की समस्या के लिए कोई चुनाव सुधार नहीं किया गया है। समय के साथ यह समस्या और भी गहरी होती चली गई है। प्रतिष्ठित संंस्था द ऐसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स की रिपोर्ट के अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 में निर्वाचित कुल सांसदो में से 251(46%) सांसदों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज है। इसमें से भी 170(31%)सांसदों के खिलाफ गँभीर प्रकृति के अपराधिक मामले अदालतों मे लंबित है।

राजनीति में अपराधीकरण की समस्या के पीछे कई राजनीतिक तथा कानूनी कारण है। राजनीतिक दल अपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को उनकी जीतने के संभावना अधिक होने के कारण उन्हें टिकट देते है। चुनाव जीतने पर पर इनकी अवैध गतिविधियों एवं कृत्यों को राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है और यह अपने विरुध्द मामलों को प्रभावित करने में सफल हो जाते है। वहीं लचर एवं जर्जर न्यायिक तंत्र के कारण उनके विरुद्ध अपराधिक मामले सालों – दशकों तक लंबित रहते है। चूंकि देश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी व्यक्ति को दोष सिध्द होने के पहले चुनाव में भाग लेने से रोकता हो। इसी खामी का फायदा अपराधी और राजनीतिक दल उठा रहे है। इन परिस्थितियों ने देश में कानून प्रवर्तन को पक्षपाती तथा कानून के शासन को कमजोर किया है। इससे लोगों का लोकतांत्रिक संस्थानों से विश्वास कमजोर होता है।

राजनीती के अपराधीकरण पर दशकों से नागरिक समाज,न्यायपालिका,चुनाव आयोग,बुद्धिजीवी वर्ग आदि लगातार चिंता जताते आए है। देश के लोकतंत्र और समाज मे पड़ रहे तमाम दुष्प्रभावों के बावजूद इस समस्या के समाधान के लिए संसद और सरकार के स्तर पर कोई दिलचस्पी नहीं है। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए है। इस संबंध में थोड़े बहुत जो भी सुधार हुए है वे न्यायपालिका की देन रहे है। भारतीय राजनीति में यह समस्या कब तक विद्यमान रहेगी इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार

देश में स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार की दरकार है। चाहे वह सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र हो या निजी स्वास्थ्य क्षेत्र दोनों में पर्याप्त सुधारो की आवश्यकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र अपनी निम्न स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के लिए पहचाना जाता है वहीं निजी स्वास्थ्य क्षेत्र इलाज के नाम पर मरीजों के आर्थिक शोषण एवं लूटने के लिए कुख्यात बन चुका है।

देश के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में किस हद तक आर्थिक शोषण तथा अनैतिक प्रथाएँ व्याप्त है, यह किसी से छिपा नहीं है। तमाम रिपोर्ट तथा लोगों के सामान्य अनुभव इसकी पुष्टि करते है। इलाज के नाम पर आर्थिक शोषण इतने चरम स्तर पर है कि प्राइवेट अस्पतालों मे इलाज के लिए जाने या भर्ती होने के नाम पर आम जनमानस के भीतर डर का भाव आ जाता है।

इस स्थिति को बदलने के लिए निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में सख्त विनियमन(Regulation) लाने की माँग सालों से की जा रही है। उल्लेखनीय है कि अभी तक इस सेक्टर को रेगुलेट नहीं किया गया है। मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक विनियमन (Regulation)का अभाव होना है, जिसका निजी क्षेत्र ने भरपूर फायदा उठाया है। इस व्यापक एवं भयावह स्थिति के बावजूद भी सरकारों ने निजी क्षेत्र को रेगुलेट करने के कोई प्रयास नहीं किए है। ध्यान देने योग्य है कि, स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है इसीलिए इसमें प्रमुख भूमिका राज्य सरकारों को निभानी है।

सरकारी सेवा क्षेत्र में सुधार

देश मे सरकारी नौकरियों में बहुत अधिक जॉब-सुरक्षा एवं स्थायित्व है। यही कारण है कि भारतीयों में सरकारी नौकरियों के प्रति बहुत आकर्षण है। लेकिन सरकारी नौकरियों में दी जा रही जॉब-सुरक्षा ने देश को पर्याप्त नुकसान पहुँचाया है। आमतौर पर सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली में कार्य के प्रति जवाबदेही,अनुशासन,कार्यदक्षतl इत्यादि का अभाव दिखाई देता है। इन कमियों को अक्सर हम सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, कार्यालयों या अन्य सरकारी संस्थानों में महसूस करते है। इसका बहुत बड़ा कारण सरकारी नौकरियों में अत्याधिक नौकरी की सुरक्षा होना है। आज सरकारें बेहतर नागरिक सुविधाएँ मुहैया कराने में असफल है। लोग गुणवत्तायुक्त सेवाओं के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए,आज अधिकाँश आबादी बच्चों की बेहतर स्कूली शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर है। हालंकि इस निर्भरता के कई कारण है किन्तु यहांँ कार्यरत सरकारी शिक्षकों में अध्यापन कार्य के प्रति जवाबदेही की कमी एक प्रमुख कारण है।

यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि कर्मचारियों की उत्पादकता, कार्यप्रदर्शन, अनुशासन, जवाबदेही के स्तर का घनिष्ट संबंध उनकी नौकरी की सुरक्षा से है। अगर कर्मचारियों के भीतर नौकरी खोने का डर होगा तो उनमें स्वतः उच्च कार्यप्रदर्शन,अनुशासन, जवाबदेही की भावना रहेगी। निजी सेक्टर इसी अवधारणा पर काम करके बेहतरीन सेवाएँ दे रहा है। हांलाकि जॉब-सुरक्षा का महत्व एवं फायदे है बशर्ते यह न्यायसंगत एवं संतुलित हो। लेकिन भारत के सरकारी सेवा क्षेत्र की नौकरियों में इसका अभाव दिखता है।

विशेषज्ञ,बुद्धीजीवी,चिंतक,और आम नागरिक यह महसूस करने लगे है कि सरकारी नौकरियों में मिल रही अत्याधिक जॉब-सुरक्षा को संतुलित एवं न्यायसंगत बनाकर, इसे कार्य-प्रदर्शन पर आधारित किया जाना चाहिए। हांलाकि कि इस पर सार्वजनिक चर्चा बहुत कम देखने को मिलती है। किन्तु यह सरकारी तँत्र की दक्षता को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है। अब इस संबंध में सरकारें कब तक सुधार करेंगी,इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है।

निष्कर्ष

उपरोक्त चर्चा के बाद निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि भारत में सुधारों के प्रति घोर उदासीनता है। यह उदासीनता देश के राजनीतिक वर्ग में अधिक है, जिसे व्यवस्था संबंधी सुधारों के लिए अततः निर्णायक भूमिका निभानी होती है। देश में विभिन्न सुधारों के लिए विधायिका तथा सरकारों को निर्णायक कदम उठाना होता है। लेकिन इसी स्तर पर सुधारों के लिए राजनीतिक मंशा एवं इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है, जिसके चलते सुधार अनिश्चित काल तक ठंडे बस्ते में पड़े रहते है और देश में समस्या दशकों तक जस की तस बनी रहती है।

चूंकि किसी भी खराब सिस्टम के कुछ लाभार्थी जरूर होते हैं जो चाहते है कि मौजूदा व्यवस्था वैसी ही बनी रहे जैसी पहले से चलती आ रही है। यही एक प्रमुख वजह है कि कुछ सुधारों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है ताकि उस लाभार्थी वर्ग के हित प्रभावित न हो। उदाहरण के लिए, चुनावी सुधार या पुलिस सुधार कुछ ऐसे सुधार है जो अगर साकार हुए तो राजनीतिक वर्ग के हित जरूर प्रभावित होंगे। इसके आलावा कुछ सुधारों पर इसलिए ध्यान नही दिया जाता है क्योंकि उसमें राजनीतिक वर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं होती है।

सुधारों के प्रति इस प्रवृति को बदलना बहुत आवश्यक है,अन्यथा देश ऐसे ही अंतहीन समस्याओं से जूझता रहेगा जैसे अभी तक जूझता आ रहा है। समस्याओं के समाधान के लिए सुधार केवल विमर्श का विषय बनने तक सीमित नहीं होने चाहिए।

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