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निजी स्वास्थ्य क्षेत्र आखिर कब तक लोगों को लूटता रहेगा ?

हम सभी जानते है कि वर्तमान में देश की अधिकतर जनता बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर निर्भर है।स्वास्थ्य, मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। यह किसी भी देश के सामाजिक विकास का आधार भी है।क्या होगा अगर स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए भी किसी देश के नागरिक निजी क्षेत्र पर निर्भर हो जाए। किसी भी निजी क्षेत्र के लिए लाभ अर्जित करना प्राथमिक उद्देश्य होता है। यह उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति भी होती है, किन्तु लोग उस पर आश्रित हो जाए तो इसका परिणाम लोगों के भारी आर्थिक शोषण के रूप में हमारे सामने होगा। यही हाल भारत के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का है। भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी क्षेत्र की लगभग 70 प्रतिशत भागीदारी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण(NFHS-5) की रिपोर्ट के अनुसार देश में निजी स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग करने वाले परिवारों का अनुपात शहरों तथा गावों में क्रमशः 51.8 प्रतिशत एवं 46.4 प्रतिशत है। इन तथ्यों से देश के नागरिकों की निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर निर्भरता की पुष्टि होती है, साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली का आभास भी होता है। इस लेख का उद्देश्य निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे शोषण के प्रति सरकारों तथा लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है।

निजी स्वास्थ्य क्षेत्र

निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त गंभीर समस्याएँ

बीतें एक दशक में स्वास्थ्य सुविधाओं का तेजी से व्यवसायीकरण हुआ है। निजी स्वास्थ्य क्षेत्र उच्च मुनाफे वाला उद्योग माना जाने लगा है। इसके दो कारण है, पहलाः सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का बेहतर न होंना, जिसके परिणामस्वरूप देश की अधिकतर जनता निजी क्षेत्र पर निर्भर हो चुकी है। दूसराः निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर ठोस विनियमन(Regulation) का अभाव- अभी तक इसे विनियमित करने के ठोस प्रयास नहीं किए गए है। आइये यहाँ व्याप्त कुछ गंभीर समस्याओं पर नजर डालें।

(1) अत्याधिक शुल्क ( overcharging)

अक्सर निजी अस्पतालों पर ओवरचार्जिंग के आरोप लगते है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग ऑथारिटी की सन् 2018 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राइवेट अस्पताल दवाओं, डायग्नोस्टिक टेस्ट और अन्य चिकित्सा उत्पादों इत्यादि पर अधिकतम 1737 प्रतिशत तक मुनाफा कमा रहें है। प्राइवेट अस्पताल दवा कंपनियों से सांठगाँठ कर दवाओं पर अधिक एमआरपी प्रिंट कराकर उसे वास्तविक कीमत से कई गुना दामों पर मरीजों को बेच रहें हैं। इसके अतिरिक्त मरीजों को अस्पताल की फार्मेसी से ही मँहगीं दवाएँ खरीदने के लिए बाध्य किया जाता हैं। इसी संदर्भ में प्रतिष्ठित अखबार दैनिक भास्कर द्वारा एक स्टिंग ऑपरेशन भी किया गया। यह आर्थिक शोषण बिना किसी रोकटोक के सालों से जारी हैं।

(2) अनावश्यक मँहगें टेस्ट एवं ट्रीटमेंट

निजी अस्पतालों पर यह आरोप लगता है कि यह अनावश्यक रूप से मरीजों को मँहगें टेस्ट एवं ट्रीटमेंट प्रिसक्राइब करते है ताकि अस्पतालों को अधिक से अधिक लाभ हो। उदाहरण के रूप हम अक्सर पाते हैं कि अस्पताल बाहर कि किसी भी टेस्ट रिपाेर्ट को स्वीकार नहीं करते हैं ताकि वे अस्पताल में अधिक से अधिक से टेस्ट कराकर राजस्व अर्जित कर सके। वहीं दूसरी ओर यह देखा जा रहा है कि निजी अस्पताल, सरकारी अस्पतालों के मुकाबले कहीं अधिक सी-सेक्शन ऑपरेशन (प्रसव) कर रहें हैं। सी-सेक्शन ऑपरेशन के वास्तविक कारण भी होते हैं किन्तु यहां आर्थिक कारण अधिक प्रभावी दिखाई पड़ता है।

(3) निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का व्यवसायीकरण(Corporatization of healthcare)

चूंकि यह उच्च मुनाफे वाला उद्योग माना जाने लगा है जिसके परिणामस्वरूप कई कंपनियां लाभ के उद्देश्य से अपनी हॉस्पिटल चेन स्थापित कर चुकीं हैं। इसका स्वाभाविक परिणाम यह सामने आया है कि अस्पतालों के लिए लाभ अर्जित करना प्राथमिक लक्ष्य बन चुका है।

(4) अनैतिक प्रक्टिस(Unethical practices)

निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्थिक लाभ के लिए बड़े पैमाने पर अनैतिक प्रक्टिस की जा रही है। यह तथ्य है कि अधिकतर प्राइवेट डॉक्टर उन्हीं दवा कंपनियों की ब्रांडेड दवाएँ प्रिसक्राइब करते है जिनसे उन्हें मोटा कमीशन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त डायग्नोस्टिक टेस्ट एवं मरीजों के रेफरल में कमीशनबाजी के अनुभवजन्य साक्ष्य दिखाई पड़ते हैं। कई बार प्राइवेट हॉस्पिटल अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से मरीजों का ओवरट्रीटमेंट भी करतें है, जिसके कारण मरीजों की मौत की खबरें भी सामने आती है। यह सभी गतिविधियाँ गंभीर रूप से चिकित्सकीय नैतिकता (medical ethics) का उल्लंघन करतीं हैं।

निष्कर्ष-

इन सभी समस्याओं के समाधान का एक ही रास्ता है कि सरकारें निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का ठोस विनियमन(Regulation) करें। इसी उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा सन् 2010 में क्लीनिकल स्टेबलिशमेंट एक्ट बनाया गया था, किन्तु अधिकतर राज्यों ने इसे लागू नहीं किया है और न ही राज्य सूची का विषय होने के नाते इस पर अपना कोई ठोस कानून बनाया है। एक तरह से कहा जा सकता है कि सरकारों ने जानबूझकर निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को अपनी मनमानी करने की छूट दे रखी है। संभवतः इसका कारण भ्रष्टाचार एवं राजनीतिक साँठगाँठ ही है। इन सबके के चलते मरीजों का आर्थिक शोषण तथा स्वास्थ्य से खिलवाड़ जारी है। अतः तत्काल आवश्यकता है कि सभी राज्य सरकारें (चूंकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है) गंभीरता से निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का ठोस विनियमन(Regulation) करें।

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