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न्यायपालिका में न्यायिक अतिक्रमण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

न्यायपालिका में न्यायिक अतिक्रमण की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। न्यायिक अतिक्रमण का अर्थ, न्यायपालिका द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लघंन कर दूसरे के अधिकार क्षेत्र में कार्य करना है। यह अतिक्रमण न्यायिक सक्रियता के नाम पर कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में किया जा रहा है। देश की ऊपरी अदालतें अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों द्वारा ऐसे निर्णय एवं कार्य किए जा रहे है जो स्पष्ट रूप से कार्यकारी या विधायी प्रकृति के है। इस लेख में न्यायपालिका कि इस असंवैधानिक प्रवृति पर गंभीर चर्चा की गई है।

न्यायिक अतिक्रमण को प्रदर्शित करता करता प्रतीकात्मक चित्र।

न्यायिक अतिक्रमण की वर्तमान स्थिति

संविधान निर्माताओं ने भारत में शक्ति पृथक्करण के सिध्दांत को अपनाया। इसके तहत् शक्तियाँ का बंँटवारा लोकतंत्र के तीन अंग – कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका के बीच किया गया है। संविधान ने विधायिका को कानून बनाने, कार्यपालिका को नीति एवं कानूनों के क्रियान्वयन तथा न्यायपालिका को न्याय देने एवं विवादों का सुलझाने का कार्य सौंपा गया है। संविधान निर्माताओं ने यह अपेक्षा की थी, कि कोई भी अंग किसी दूसरे अंग के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करेगा।

भारत की न्यायपालिका ने 1980 के दशक मे न्यायिक सक्रियता की ओर कदम बढ़ाया। न्यायिक सक्रियता का अर्थ, नागरिक अधिकारों के संरक्षण तथा समाज में न्याय को बढ़ावा देने के लिए न्यायपालिका द्वारा सक्रिय भूमिका निभाने से है। इसी संदर्भ में सर्वाेच्च न्यायलय ने जनहित याचिका की नई अवधारणा दी जिसके तहत् किसी जनहित के मामले पर पीड़ित पक्ष के अलावा अन्य पक्ष भी सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायलयों में केस दायर कर सकते हैं।

जनहित याचिकाओं ने समाज में न्याय को विस्तार दिया। निर्धन, वंचित और सामाजिक,शैक्षिक एवं आर्थिक विवशताओं के कारण जो लोग न्यायालयों तक पहुँच पाने में असक्षम थे, उनके लिए यह न्याय पाने के लिए सुलभ तथा महत्वपूर्ण साधन बनी।

न्यायिक सक्रियता का नकारात्मक पहलु न्यायिक अतिक्रमण है। न्यायपालिका द्वारा अक्सर नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप किया जाने लगा है। कभी किसी फिल्म के दृश्य या डॉयलाग, यातायात या ट्रेफिक जाम, सड़को के गड्ढे, सीसीटीवी कैमरे, लोकव्यवस्था से जुड़े विषयों इत्यादि मामलों से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर अदालतों द्वारा सुनवाई करना बहुत सामान्य न्यायिक परंपरा बन चुकी है। कभी अनाधिकार यानि अधिकारिता से परे विषयों पर कमेटी गठित करना, सरकार से स्टेटस रिपोर्ट माँगना। जबकि इनमें से अधिकतर ऐसे मामले होते हैं जो न्यायिक अधिकार क्षेत्र से बाहर के होते हैं।

न्यायिक अतिक्रमण से जुड़ा प्रसिद्ध मामला, श्याम नारायण चौकसे(2016) द्वारा दायर जनहित याचिका के निर्णय का है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में फिल्म शुरु होने से पहले राष्टगान अनिवार्य करने का फैसला सुनाया। हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे बदल दिया। लेकिन इसमें साफ तौर पर न्यायिक अतिक्रमण दिखाई पड़ता है, जबकि इस पर निर्णय लेने या कानून बनाने का अधिकार कार्यपालिका या विधायिका(संसद) का था। न्यायपालिका द्वारा अपनी न्यायिक सीमाओं की अवहेलना करने की इसी प्रवृति की आलोचना की जाती है।

न्यायिक अतिक्रमण का लोकतंत्र पर प्रभाव

चूंकि न्यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग हैं। तीनों अंग अपने कार्यों से देश के नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं। कार्यपालिका एवं विधायिका समस्त नागरिकों का प्रतिनिधित्व करतीं हैं एवं जनता के प्रति जवाबदेह हैं और इनके द्वारा निर्मित नीतियों एवं कानून, जनता की आकांक्षाओं के प्रतिबिंब(Reflection) होते है

न्यायपालिका का कार्य न्याय देना एवं विवादों को सुलझाना है। अगर न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र की अवहेलना कर कार्यपालिका तथा विधायिका के अधिकार क्षेत्र के तहत् आने वाले कार्यों को करने लगेगी ; तो यह संभव है कि यह जनआकांक्षाओं के अनुरूप न हो। यह अपने आप में अलोकतांत्रिक होगा, क्योंकि न्यायपालिका जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है।

उदाहरण के लिए, अगर न्यायपालिका समलैंगिक विवाह तथा मेरिटल रेप जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर न्यायिक सक्रियता के नाम पर कोई निर्णायक फैसला सुना देती है, तो हो सकता है कि यह जनआकांक्षाओं के विपरीत हो। चूंकि मूलतः इन मुद्दों पर निर्णय लेने या कानून बनाने का अधिकार विधायिका का है, और सामाजिक मुद्दो पर कानून निर्माण करते समय जनता की आंकाक्षाओं का ध्यान रखना विधायिका की जिम्मेदारी है।

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न्यायपालिका से अपेक्षित भूमिका

भारत में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक माना गया है। न्यायपालिका ही यह सुनिश्चित करती है कि देश में कानून एवं नीति निर्माण संविधान के प्रावधानों के अनुरूप हो। इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक स्थिति होने के बावजूद अगर न्यायपालिका ही संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत काम करे, तो यह विरोधाभासी स्थिति है।

संविधान में न्यायपालिका से नागरिक अधिकारों की सुरक्षा एवं न्याय सुनिश्चित करने की अपेक्षा गई है। निसंदेह न्यायपालिका ने इसे न्यायिक सक्रियता एवं जनहित यााचिकाओं की व्यवस्था के माध्यम से बखूबी किया है और इसका फायदा देश के समस्त नागरिकों को हुआ है। लेकिन समय के साथ न्यापालिका में न्यायिक अतिक्रमण की प्रवृति का उभार हुआ है, जो लोकतंत्र के लिए अवाँछनीय स्थिति है।

देशभर में लगभग पाँच करोड़ से अधिक मामलें(मुकदमें) लंबित है। इसमें सुप्रीम कोर्ट में 60 हजार, राज्यों के उच्च न्यायलयों में 58 लाख और शेष मामलें निचली अदालतों में लंबित हैं। इतनी बड़ी संख्या में मामले लंबित होने के बाद, अगर ऊपरी न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायालय ) अपना कीमती समय तथा ऊर्जा ऐसे विषयों या मामलों में खपा देंगे, जो उनकी न्यायिक सीमाओं के बाहर है; तो इसका प्रतिकूल प्रभाव न्यायपालिका के मूलभूत उद्देश्यों एवं कार्यों पर पड़ेगा।

न्यायपालिका को यह समझना होगा कि वह न्यायिक सक्रियता एवं जनहित के नाम पर लोकतंत्र के दूसरे अंगो के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। संविधान उसे यह अधिकार नहीं देता है और न ही संवैधानिक नैतिकता इसकी इजाजत देती है।

निष्कर्ष

उपरोक्त की गई चर्चा के संदर्भ में मेरा स्पष्ट निष्कर्ष दृष्टिकोण है कि न्यायपालिका को न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण के बीच मौजूद पतली रेखा के प्रति सचेत रहना चाहिए। न्यायिक सक्रियता की अवधारणा अत्यंत व्यापक है किन्तु भारतीय न्यायपालिका का दायरा इतना व्यापक नहीं है कि वह हर मामलों मे एक्टिविज्म(सक्रियतावाद ) करने लग जाए। किन्हीं मामलों मे जनहित निहित है, तो केवल इस आधार पर न्यायालयों को यह अधिकार नहीं है कि वे उस पर नीतिगत फैसले लेने लगें। न्यायपालिका में इतनी स्पष्टता होनी चाहिए कि वे किस सीमा तक न्यायिक सक्रियता करेंगे ताकि लोकतंत्र के दूसरे अंगों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण न हो।

शक्ति संतुलन का सिद्धांत संविधान की मूल भावना में से एक है। इसके तहत तीनों अंग- विधायिक, कार्यपालिका तथा न्यायपालिक परस्पर एक-दूसरे पर अकुंश रखतें हैं। कार्यपालिका या विधायिका अगर असंवैधानिक कार्य करें तो न्यायपालिका पर उन्हें रोकने की जिम्मेदारी है वहीं दूसरी ओर यदि न्यायपालिका असंवैधानिक कार्य करने लगे तो उसे रोकने की जिम्मेदारी कार्यपालिका तथा विधायिका की है।

कार्यपालिका तथा विधायिका ने न्यायिक अतिक्रमण को लंबे समय से नजरअंदाज करती आ रही है, जिससे न्यायपालिका में न्यायिक अतिक्रमण की परंपरा विकसित हो गई है,जिसके चलते वे सरकारों के नियमित कार्यों में अनावश्यक रूप से दखल देने लगीं हैं। अतः संसद की जिम्मेदारी है कि वह समुचित संवैधानिक कदम उठा कर न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को और अधिक स्पष्ट करे, ताकि न्यायिक अतिक्रमण को रोका जा सके। यहीं भारत के लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा।

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