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सरकारी कर्मचारियों को मिल रही अति जॉब-सुरक्षा देश को नुकसान पहुँचा रही है।

किसी भी नौकरी पेशा व्यक्ति के लिए जॉब-सुरक्षा अर्थात उसके रोजगार की सुरक्षा बहुत मायने रखती है। यह व्यक्ति के भीतर स्थिरता का भाव पैदा करती है, न केवल मानसिक तौर पर बल्कि वित्तीय रूप से भी। लेकिन क्या हो अगर किसी व्यक्ति को इतनी अधिक जॉब-सुरक्षा दे दी जाए कि उसमें कार्यकुशलता तथा अनुशासन ही क्षीण होने लग जाए। ऐसा ही कुछ हाल भारत के सरकारी कर्मचारियों का है।

भारत में सरकारी नौकरी विशेष तौर पर नियमित नौकरियों में बहुत अधिक जॉब-सुरक्षा दी जाती है। लेकिन समय के साथ अति जॉब-सुरक्षा दिये जाने के दुष्प्रभाव सरकारी तंत्र एवं सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली में दिखाई देने लगे है। इसके कारण सरकारी कर्मचारियों के भीतर कार्यकुशलता तथा जवाबदेही का अभाव हुआ है साथ ही सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर भी नकारात्मक असर पड़ा है। आज भारत के अधिकांश नागरिक सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली से असंतुष्ट रहते है। इस लेख में इस अनकहे मुद्दे पर गंभीर एवं विस्तृत चर्चा की गई है।

सरकारी कर्मचारियों की एक प्रतीकात्मक तस्वीर।

जॉब-सुरक्षा का सरकारी कर्मचारियों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव।

किसी भी नौकरी में जॉब-सुरक्षा प्रदान करना कोई गलत नहीं है। इसके कारण कर्मचारी अपने कार्यों में बेहतर तरीके से ध्यान केन्द्रित कर पाते है। यह जॉब-सुरक्षा का एक सकारात्मक पहलु माना जा सकता है। लेकिन इससे अगर कर्मचारी के भीतर अपनी नौकरी के प्रति अति सुरक्षा की भावना पैदा हो तो यह कई समस्याओ को जन्म देती है। यही नकारात्मक पहलु भारत मे सरकारी नौकरियों एवं इसमें कार्यरत सरकारी कर्मचारियों की जॉब-सुरक्षा के संदर्भ में हावी हो गया है।

भारत में सरकारी कर्मचारियों को मिल रही अति जॉब-सुरक्षा के कारण उनके मन मे यह मानसिकता(माइंडसेट) बन चुकी है कि वे चाहे ठीक ढंग से काम करें या न करें या कितना भी गैर-अनुशासनात्मक आचरण करें, उन्हें नौकरी से कोई हटा नहीं सकता है। चूंकि विचार ही किसी व्यक्ति के व्यवहार को चलाता है तथा ऐसी विकृत मानसिकता स्वाभाविक रूप से किसी भी कर्मचारी के भीतर निकम्मापन तथा गैरजिम्मेदारी पैदा करेगी। इसी मानसिकता का ही परिणाम है कि कार्यकुशलता का अभाव, गैर-उत्पादकता(Unproductivity), गैर-जबावदेही, भ्रष्टाचार, कर्तव्यों के प्रति लापरवाही एवं उदासीनता, कार्यस्थल पर देर से पहुँचना, इत्यादि सरकारी कर्मचारियों की पहचान एवं उनकी कार्यसंस्कृति(Work culture) का हिस्सा बन चुके है।

अक्सर सरकारी स्कूलों में शिक्षकों द्वारा ठीक से अध्यापन कार्य न करने या फिर सरकारी अस्पतालों में कार्यरत मेडिकल स्टाफ द्वारा मरीजों के इलाज में लापरवाही बरतने तथा सरकारी डॉक्टरों के ड्यूटी के दौरान प्राइवेट प्रेक्टिस करने की शिकायतें आती है। यह सब इन सरकारी संस्थानों मे बहुत सामान्य बात हो चुकी है। लोगों के अनुभव भी इसकी पुष्टी करते है। इन सभी स्थितियों ने सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता को निम्न स्तर पर ला दिया है। दूसरी ओर अधिकतर सरकारी कंपनियों विशेष रूप से सर्विस सेक्टर जिसमें कार्यकुशलता तथा ग्राहक संतुष्टि सर्वाधिक मायने रखती है; से जुड़ी सरकारी कंपनियों जैसे बीएसएनएल, एमटीएनएल, एयर इंडिया जैसी कंपनियो के लगातार घाटे मे रहने के पीछे वहीं सरकारी कर्मचारियों की घटिया कार्यशैली प्रमुख कारणों मे से एक है। सरकारों द्वारा लोगों के बुनियादी सार्वजनिक सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए PPP(पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल की ओर रुख करना भी सरकारी कर्मचारियों की कार्यकुशलता(Work efficiency) पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। अतः नौकरी में अतिसुरक्षा की भावना ही इस प्रकार की परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है।

सरकारों की भूमिका

सरकार किसी भी देश या प्रदेश की मुख्य नेतृत्वकर्ता संगठन होती है। यह अपने आदेशों, नीतियों, योजनाओं तथा शासन संबंधी कार्यों इत्यादि का क्रियान्वयन अपने अधीन कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के माध्यम से करती है। कोई भी संगठन तभी बेहतर काम कर सकता है जब उसमें कार्यरत मानव संसाधन उत्पादक(Productive), कार्यकुशल, जवाबदेह तथा उच्च कार्यप्रदर्शन करने वाला हो। दुर्भाग्यवश अधिकतर सरकारी कर्मचारियों में इन गुणों की कमी दिखाई पड़ती है जिसका मुख्य कारण सरकारों की अपने कर्मचारियों के बेहतर प्रबंधन तथा उनकी कार्यसंस्कृति मे सुधार करने में अरुचि होना है

हांलाकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सरकारे, सरकारी तंत्र की दक्षता बनाए रखने के लिए सरकारी कर्मचारियों के बर्खास्त नहीं कर सकती है। संविधानिक कानूनों के तहत उचित प्रकिया का पालन करके कमजोर प्रदर्शन वाले एवं लापरवाह कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है। लेकिन अमूमन सभी सरकारों में सामान्यतः गंभीर कदाचरण(Misconduct) के बावजूद भी सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त नहीं करने की परंपरा सी विकसित हो गई है। इसी का परिणाम है कि हम सरकारी तंत्र मे निम्न उत्पादक, कम कार्यकुशल एवं गैर जवाबदेह कर्मचारियों की फौज देख रहे है।

देश मे नियमित सरकारी कर्मचारियों को शानदार वेतन, भत्ते एवं सुविधाएँ मिलती है। सरकारों के सालाना बजट का बड़ा हिस्सा इनके वेतन एवं पेंशन मे खर्च किया जाता है। यह खर्च हर साल लगातार बढ़ते भी जा रहा है। इसके बावजूद भी सरकारी कर्मचारियों के कामकाज से नागरिक सामान्यतः असंतुष्ट रहते है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण, विरोधाभासी तथा विचित्र स्थिति है। यह दर्शाता है कि सरकारें, सरकारी कर्मचारियों की घटिया कार्यसंस्कृति को बदलने के प्रति अनिचछुक एवं उदासीन रहीं है।

निष्कर्ष

उपरोक्त चर्चा के बाद निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि सरकारी नौकरियों में जॉब-सुरक्षा को न्यायसंगत बनाना जरुरी है। जॉब-सुरक्षा इतनी ज्यादा भी न हो कि सरकारी कर्मचारियों के भीतर अपनी नौकरी के प्रति अति-सुरक्षा की भावना विकसित हो जाए ,जोकि हो भी चुकी है। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि डर अपने आप में एक नियंत्रण शक्ति है जो व्यक्ति के कार्यों, व्यवहारों को नियंत्रित करती है। अगर किसी संगठन में कार्यरत लोगों के भीतर नौकरी खो देने का डर बिल्कुल भी खत्म हो जाए तो यह कार्मिक प्रशासन के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। यह उसी तरह की स्थिति है कि अगर किसी सरकार के भीतर सत्ता से बाहर हो जाने का डर समाप्त हो जाए तो स्वाभाविक रूप से उसमें बेहतर काम न करने की भावना तथा तानाशाही प्रवृत्ति उभरने लगेगी। अत: सरकारों को सरकारी नौकरियों में सुधारों(Reform) में अब ज्यादा देरी नहीं करनी चाहिए।

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