सूदखोरी(Usury) कर्ज देने की लंबे समय से चली आ रही प्रथा है। सूदखोरी से आशय कर्ज पर अत्यधिक एवं अनैतिक ब्याज दर वसूलने से है। ऋण की इस व्यवस्था में उधारकर्ताओं का जमकर आर्थिक शोषण होता है। इस व्यवस्था को ‘साहूकारी’ के नाम से भी जाना जाता है। किसानों तथा गरीब तबके के लोगों की कर्ज पाने के लिए इस पर लंबे समय तक निर्भरता रही है। हांलाकि बैंकिंग सुविधाओं के विकास के कारण लोगों की निर्भरता निश्चित ही कम हुई है।

भारत में सूदखोरी का इतिहास अत्याधिक शोषणकारी तथा डरावना रहा है। इसका अंदाजा हाल-फिलहाल के सूदखोरी से जुड़े मामले से लगा सकते है, जिसमें महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में एक किसान का 1 लाख रुपये का कर्ज ब्याज सहित 74 लाख रुपये बन गया तथा सूदखोरों के दबाव के चलते उस किसान को अपनी किडनी बेचनी पड़ गयी। अक्सर सूदखोरी के झकझोर देने वाले ऐसे मामले देशभर से सामने आते रहते है।
सूदखोरी ऐसा व्यवसाय रहा है जिसमें संवेदनाएँ शुन्य होती है तथा सूदखोर स्वयं के लाभ के लिए किसी भी हद तक चले जाते है। प्राय: सूदखोर दबंग या अपराधिक प्रवृत्ति के होते है या फिर उनमें किसी भी तरह से कर्ज वापस वसूलने की क्षमता होती है, जिसके चलते वे कर्जदारों को डरा-धमकाकर तथा दवाब के जरिए आसानी से मूलधन से कई गुना पैसे वसूल लेते हैं। कई बार कर्जदारों की सम्पत्तियों को हड़प लिया जाता है। अक्सर कर्ज के बोझ के चलते लोगों द्वारा आत्महत्या करने के मामले सामने आते रहते है। इस प्रकार के अधिकांश मामलों में कर्ज गैर-संस्थागत स्रोतों यानि सूदखोरो (साहूकारों) से लिया गया होता है।
भारत में सूदखोरी को नियंत्रित करने के लिए अनेक राज्यों के अपने–अपने राज्य कानून है। इन कानूनों में मुख्यतः उच्च ब्याज दर पर नियंत्रण तथा अवैध सूदखोरी को रोकने से संबधित प्रावधान है। हालांकि के ये कानून महज शोपीस एवं निष्प्रभावी बने हुए है। इनका जमीनी स्तर पर कोई प्रवर्तन नहीं होता है। चूंकि सूदखोरी का धंधा असंगठित है, इसलिए कानून के माध्यम से इसे विनियमित करना तथा कर्जदारों के शोषण को रोक पाना कठिन होता है।
निष्कर्ष
आज देश में शहरी क्षेत्रों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक संस्थागत ऋण आसानी से उपलब्ध है। बैंक, फायनेंस कंपनी, सरकारी योजनाओं के तहत ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, ग्रामीण क्षेत्र मे महिला स्वयं सहायता समूह इत्यादि ऋण के विनियमित एवं सुरक्षित संस्थागत स्रोत है। यहाँ कर्जदारों के शोषण होने की संभावना न के बराबर होती है। संस्थागत ऋण सुविधाओं के उल्लेखनीय विकास एवं लोगों तक आसान पहुँच के चलते सूदखोरी जैसी सदियों पुरानी शोषणकारी प्रथा को अस्तित्व मे बने रहने देने की कोई बाध्यता नहीं है। जब तक समाज में इसकी मौजूदगी रहेगी तब तक लोग अपनी मूर्खता, नासमझी तथा वित्तीय साक्षरता के अभाव के कारण सूदखोरी के चंगुल में फँसकर बर्बाद होते रहेंगे। अतः उचित कदम यही होगा कि सख्त देशव्यापी कानून के द्वारा सूदखोरी को देशभर में पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए।
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