google-site-verification: google487521925613d3a2.html

विधायिका में महिला आरक्षण चुनावी लोकतंत्र को कमजोर कर देगा।

संसद द्वारा महिलाओं को विधायिका (लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं) में एक-तिहाई आरक्षण देने के लिए कानून पास किया जा चुका है। इसे आमतौर पर महिला आरक्षण अधिनियम कहा जाता है। इसमें कोई संदेह नही हैं कि महिलाओं का देश की विधायिका में कम प्रतिनिधित्व है। 18 वी लोकसभा(2024-29) में महिला सांसदों की संख्या 74 है जो कुल सदस्य संख्या का मात्र 13.69 प्रतिशत है। राज्य विधानसभाओं में भी कुछ ऐसी ही समान स्थिति है।

महिलाओं का विधायिका में प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए; इस पर सभी वर्ग सहमति रखते हैं- चाहे वह नागरिक समाज, राजनीतिक या बौद्धिक वर्ग हो। लेकिन इसके लिए आरक्षण प्रदान करना उचित प्रतीत नहीं होता है क्योंकि भले ही महिला आरक्षण सैद्धांतिक रूप से सही लगे लेकिन इसके कारण कुछ ऐसे व्यावहारिक परिणाम सामने आएंगे जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व एवं चुनावी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को नुकसान पहुँचेगा। आइए चर्चा करे-

महिला आरक्षण के विरोध का प्रतीकात्मक चित्र।

चुनावी लोकतंत्र में जितना महत्वपूर्ण वोट देने का अधिकार है उतना ही महत्वपूर्ण मतदाताओ के समक्ष चुनाव के विकल्पों का मौजूद होना है। महिला आरक्षण निश्चित ही मतदाताओ के सामने चुनाव के विकल्पों को सीमित कर देगा। वर्तमान में एससी-एसटी वर्ग के लिए पहले से ही आरक्षण है, अब महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण चुनावों में मतदाताओ के लिए विकल्पों तथा चुनाव लड़ने के लिए समान अवसरों को और अधिक सीमित एवं नियंत्रित करने वाला कदम सिद्ध होगा। ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान मे विधायिका मे एससी-एसटी वर्ग के लिए आरक्षित सीटों मे भी इन वर्गों की महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण मिलेगा। आरक्षण मे जितना वर्गीकरण होता जाएगा, मतदाताओं के समक्ष चुनने के विकल्प कम होते चले जाएंगे। उदाहरण के रूप में – अगर कोई सीट एसटी महिला के लिए आरक्षित हैं तो उसमें केवल एसटी वर्ग की महिलाओं को ही चुनाव लड़ने का अधिकार है। ऐसे मे शेष लोगों के पास चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होगा और लोगों के पास केवल आरक्षित उम्मीदवारों में से चुनने के सिवाय कोई अन्य विकल्प भी नही होगा। ऐसी परिस्थितियों में क्या चुनावों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांतों के अनुरूप माना जा सकता है? बिल्कुल नही।

महिला आरक्षण के चलते एक-तिहाई सीटें में केवल महिला उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार होगा। ऐसे में उस आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के अन्य नागरिकों ( इस संदर्भ मे विशेष रूप से पुरूषों) के चुनाव लड़ने का लोकतांत्रिक अधिकार खत्म हो जाएगा। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए आदर्श स्थिति नहीं मानी जा सकती है। इस पर यह तर्क दिया जा सकता है कि वर्तमान में विधायिका मे एससी-एसटी तथा स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि विधायिका में एससी-एसटी आरक्षण मूल रूप से संविधान लागू होने से 10 वर्षों के लिए प्रदान किया गया था। हालांकि देश की राजनीतिक परिस्थितियों के चलते यह अब तक जारी है। इसके आलावा अन्य किसी भी आधारों पर विधायिका में आरक्षण प्रदान करने की मंशा संविधान निर्माताओं की नहीं थी। जहाँ तक स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण की बात है तो, स्थानीय निकाय विधायिका नहीं है, यह केवल स्थानीय विकास के लिए जिम्मेदार संस्थाएँ मात्र है। इनके पास कानून एवं व्यापक नीतियाँ बनाने की कोई शक्ति नहीं होती है। यही कारण है कि इस स्तर पर महिला आरक्षण का कभी विरोध नही हुआ है। हांलाकि यहाँ भी महिला आरक्षण की व्यावहारिक स्थिति अच्छी नहीं है।

महिला आरक्षण फिलहाल 15 वर्षों के लिए है जिसे संसद द्वारा आगे भी जारी रखा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह अनिश्चित काल तक बढ़ता चला जाएगा। महिला आरक्षण अधिनियम के अनुसार आरक्षित सीटों का प्रत्येक परिसीमन के बाद रोटेशन होगा यानि अन्य एक-तिहाई सीटें महिलाओ के लिए आरक्षित हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि संविधान प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान करता है। अब सवाल यह है कि जब किसी सामान्य निर्वाचन सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्ति के मानस मे यह विचार उत्पन्न होगा कि आगामी समय में उसकी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएगी, जिससे उसके फिर से चुने जाने की कोई संभावना ही नहीं है तो उसके भीतर बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरणा या उत्साह कैसे आएगा। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि भविष्य के लाभ व्यक्ति को वर्तमान में बेहतर काम कार्य करने की प्रेरणा देते हैं। इसे एक उदाहरण से समझे – अगर कोई सरकार आश्वस्त हो जाए कि आगामी चुनावों में उसकी जीत या वापसी की कोई संभावना नहीं है तो वह शायद ही वर्तमान में जनता के लिए बेहतर काम कर पाएगी, क्योंकि बेहतर कार्य का कोई लाभ मौजूद ही नहीं है।

वर्तमान में देश की चुनावी राजनीति में आम नागरिकों का प्रवेश करना काफी जटिल माना जाता है। भारतीय राजनीति में ऐसे कई फेक्टर एवं व्यावहारिक चुनौतियाँ है, जो किसी आम नागरिक को राजनीति में आने से हतोत्साहित करती है। विधायिका मे आरक्षण नागरिको के अनारक्षित वर्ग के लिए एक नई बाधा या चुनौती बन सकती है। व्यावहारिक तौर पर किसी भी व्यक्ति के लिए अपने निवास क्षेत्र से निर्वाचित होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। बड़े एवं स्थापित राजनेता तो अन्य क्षेत्रों से भी चुनाव लड़कर विधायिका में पहुँच जाते है। आरक्षण के कारण अब कोई अनारक्षित नागरिक चुनाव लड़ना चाहे तो उसकी पहली बड़ी चुनौती चुनाव जीतने के बजाय अपने लिए अनारक्षित सीट खोजना होगी जहाँ से चुनाव लड़ सके, क्योंकि सभी जगह चुनाव लड़ने के समान अवसर मौजूद ही नहीं है।

निष्कर्ष

आरक्षण दोधारी तलवार की तरह है। एक ओर यह किसी के लिए रास्ता सुगम बनाती है तो दूसरी ओर किसी के लिए रास्ता कठिन भी बना देती है। विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए किन्तु लोकतांत्रिक सिद्धांतों की कीमत पर नहीं। महिला आरक्षण से विधायिका में महिला प्रतिनिधियों की संख्या तो बढ़ जाएगी लेकिन मेरिट (योग्यता) जैसे तत्व पीछे छूट जाएँगे। यह समझना जरूरी है कि चुनाव, सरकारी नौकरी का इम्तहान नही है जहाँ आरक्षण के जरिए हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास किए जाएँ। चुनाव लोकतंत्र की जननी है, यहाँ समान अवसर और योग्यता(मेरिट) होना आवश्यक है, अन्यथा इसके अभाव के कारण आबादी का बड़ा हिस्सा चुनावी राजनीति से दूर होता चला जाएगा।

विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नैसर्गिक रूप से बढना चाहिए, बजाय इसके कि आरक्षण के जरिए अन्य नागरिकों के लिए समान अवसर ही खत्म कर दिए जाए। अगर महिला आरक्षण जरूरी ही है तो इसे दलों के भीतर टिकट वितरण मे लागू किया गए। अनेक विकसित लोकतांत्रिक देशों ने इस मॉडल को अपनाया है। इससे स्वाभाविक रूप से विधायिका मे महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा तथा चुनाव में सभी नागरिकों के समान अवसरों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

READ ALSO – भारत में किसी भी क्षेत्र के सुधारों(Reforms) में देरी क्यों होती है?

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top