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सरकारें फ्रीबीज के जरिए लोगों को जरूरी मुद्दों से भटकाने मे सफल साबित हुई है।

हाल के वर्षों मे भारत की चुनावी राजनीति मे मुफ्त योजनाओं, जिन्हे आमतौर पर फ्रीबीज कहा जाता है, की भूमिका में बढ़ोतरी देखी गई है। चुनावों मे राजनीतिक दल तमाम् फ्रीबीज देने के वादे एवं प्रलोभन देते है। महिलाओं को प्रतिमाह धनराशि, मुफ्त बस यात्रा, फ्री बिजली-पानी, मुफ्त गैस सिलेण्डर, इत्यादि वर्तमान के प्रचलित फ्रीबीज है। सरकारों और दलों द्वारा दावा किया जाता है कि इसका उद्देश्य लोक कल्याणकारी है किन्तु असल में चुनावी फायदा पाना इसका उद्देश्य होता है। सरकारों के लिए फ्रीबीज ऐसा हथियार साबित हुआ है जिसके जरिए वे लोगों के ध्यान को जरूरी मुद्दों से भटकाने में सफल होती दिख रही है। ध्यान देने योग्य है कि फ्रीबीज का चुनावी फायदा मौजूदा सत्ताधारी दल को होता है क्योंकि वह वर्तमान में फ्रीबीज दे रही होती है।

देश की राजनीति पहले से जातिवाद,संप्रदायवाद,भाषावाद,क्षेत्रवाद जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। अब इस कड़ी में फ्रीबीज एक नई समस्या के रूप में जुड़ गई है। फ्रीबीज के जरिए आबादी के ऐसे वर्गों को टारगेट किया जा रहा है जो आर्थिक तथा शैक्षिक रूप से कमजोर है ताकि उनमें व्याप्त राजनीतिक जागरुकता की कमी का फायदा उठाया जा सके। इन्हें तात्कालिक लाभ देकर भ्रमित कर पाना अपेक्षाकृत आसान होता है। वर्तमान में यह सॉफ्ट टारगेट ग्रामीण भारत की महिला वोटर है। सरकारों की अधिकांश फ्रीबीज योजनाएँ महिला केन्द्रित होती है। यह कड़वा सत्य है कि ग्रामीण भारत में महिलाओं मे अशिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में कम सक्रियता के कारण राजनीतिक जागरुकता का अभाव है। सरकारों ने इन्हें फ्रीबीज देकर इसी कमी का फायदा उठाने  का प्रयास किया है और वह इसमें सफल भी हुई है। पिछले कुछ वर्षो में विभिन्न राज्यों के चुनावों में सरकारों को फ्रीबीज के दम पर दोबारा प्रचंड बहुमत से वापसी करते हुए देखा गया है। हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में सत्ताधारी दल ने चुनाव से ठीक पहले सवा करोड़ महिलाओं को स्वरोजगार के नाम पर दस-दस हजार रुपये देकर बीस सालों की सत्ता विरोधी लहर के बावजूद शानदार जीत हासिल की।  ऐसे उदाहरण कई राज्यों के चुनाव परिणामों मे नजर आए है। यह दर्शाता है कि फ्रीबीज मतदाताओं के मतदान व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। यह किसी भी तरह से स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकती है।

सर‌कारे फ्रीबीज को चुनाव जीतने का शॉर्टकट फार्मूला मान चुकी है। यही कारण है विभिन्न राज्य अपनी कमजोर राजकोषीय स्थिति के बावजूद बजट का बड़ा हिस्सा फ्रीबीज पर खर्च कर रहे है। इसके लिए राज्य सरकारे कर्ज पर कर्ज ले रही है। आरबीआई समेत तमाम अर्थशास्त्री इस प्रवृत्ति पर लगातार चिंता जता रहे हैं, किन्तु इसके बावजूद सरकार चुनावी फायदे के लिए सार्वजनिक धन को फ्रीबीज पर लुटाने को तत्पर है। यह सिलसिला फिलहाल तो थमने वाला नही है क्योंकि देश की मौजूदा राजनीति का जो चरित्र है, वहाँ सत्ता प्राप्ति ही दलों की मुख्य उद्देश्य होता है और उसके लिए वे किसी भी चीज को दाँव मे लगा सकते है।

जब फ्रीबीज चुनावी जीत में निर्णायक भूमिका निभाने लगते है तो सरकारों तथा राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं से जनता के जरूरी मुद्दे गायब होते चले जाते है। वर्तमान में यही हो रहा है। दलों के चुनावी घोषणापत्रों में असल मुद्दों से ज्यादा लुभावने फ्रीबीज के वादे होते है। राजनीतिक दलों मे चुनाव से पहले एक प्रतिस्पर्धा सी दिखाई पड़ती है कि कौन कितना अधिक मुफ्त दे सकता है। ऐसे परिदृश्य में जब कोई सरकार अपने कामकाज या गुण-दोष के बजाय फ्रीबीज के दम पर सत्ता हासिल कर लेती है तो उसमें स्वाभाविक तौर पर जवाबदेही की कमी होगी। इसके परिणामस्वरूप कुशासन की प्रवृत्ति पैदा होने की संभावना होती है।

निष्कर्ष

एक बात स्पष्ट है कि फ्रीबीज की संस्कृति तब तक बंद नहीं होगी जब तक राजनीतिक दलों को इससे चुनावी फायदा मिल रहा है। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग, जो फ्रीबीज का लाभार्थी है उसे इस आधार पर दलों को वोट देना बंद करना होगा। चिंताजनक यह है कि यह जो लाभार्थी वर्ग है इसमें राजनीतिक परिपक्वता की कमी है और यह संख्या में भी अधिक है तथा चुनाव संख्याबल से ही जीते जाते है। अतः नागरिक समाज, बुध्दीजीवियों तथा सजग नागरिकों का यह विशेष कर्तव्य है कि वह इन फ्रीबीज के लाभार्थी वर्गों मे राजनीतिक होश पैदा करे क्योंकि उनके द्वारा फ्रीबीज के आधार पर वोट देने से देश के लोकतंत्र को नुकसान हो रहा है।

(यह लेखक के अपने विचार है)

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